गृहस्थी में दो बातें जरूरी हैं तभी मिलेगा सुख
अगर हम ये मानें कि गृहस्थी एक वृक्ष है तो इसके फल क्या हैं। गृहस्थी के वृक्ष के दो ही फल हो सकते हैं संतुष्टि और शांति। अगर दाम्पत्य में ये दोनों फल नहीं हैं तो गृहस्थी बंजर है। ये दो फल ही तय करते हैं कि आपका दाम्पत्य कितना सफल है।
जिस घर में संतुष्टि और शांति नहीं हो, वो असफल है। परिवार के वृक्ष पर ये फल तब ही लगेंगे, जब जड़ें गहरी और मजबूत होंगी। जड़ों में जब पर्याप्त जल और खाद डाली जाती है, तब वृक्ष फलता-फूलता है। यही प्राकृतिक समीकरण गृहस्थी पर भी लागू होता है। जैसे वृक्ष हमसे मांगते कम हैं और हमें देते ज्यादा हैं, यही सिद्धांत जब परिवार के सदस्यों में उतरता है तो गृहस्थी यहीं वैकुंठ बन जाती है। समर्पण का भाव जितना अधिक होगा, देने की वृत्ति उतनी ही प्रबल होगी।
स्त्री और पुरुष दोनों के धर्म का मूल स्रोत समर्पण में है। इस प्रवृत्ति को अधिकार द्वारा लोग समाप्त कर लेते हैं। घर-परिवार में हम जितना अधिक अधिकार बताएंगे, विघटन उतना अधिक बढ़ जाएगा। प्रेम गायब हो जाएगा और भोग घरभर में फैल जाएगा। एक-दूसरे को सुख पहुंचाने, प्रसन्न रखने के इरादे खत्म होने लगते हैं और मेरे लिए ही सबकुछ किया जाए, यह विचार प्रधान बन जाता है। स्वच्छंदता यहीं से शुरू होती है, जो परिवार के अनुशासन को लील लेती है।
भागवत में चलते हैं, ऋषि कश्यप और दिति के दाम्पत्य में। ऋषि कश्यप की कई पत्नियां थी, वे सभी बहनें थी और प्रजापति दक्ष की पुत्रियां थी। धरती के सारे जीव, देवता और दानव इन्हीं की संतानें मानी जाती हैं। अदिति से सारे देवताओं का जन्म हुआ, जबकि दिति से दानवों का। पिता एक ही है लेकिन संतानें एकदम अलग-अलग। सिर्फ दाम्पत्य में संतुष्टि और शांति का फर्क है। अदिति और कश्यम के दाम्पत्य में ये दोनों बातें थीं लेकिन दिति ने अपने भोग और वासना के आगे, शांति और संतुष्टि दोनों को त्याग दिया।
जिस समय ऋषि कश्यप संध्या-पूजन के लिए जा रहे थे, दिति ने कामवश होकर उसी समय उनसे रतिदान मांग लिया। देव पूजन के समय भी संयम नहीं बरता गया। कश्यम ने पत्नी की इच्छा तो पूरी कर दी लेकिन उसे ये भी बता दिया इस रतिदान से जो संतानें उत्पन्न होंगी वे सब दुराचारी होंगी।
गृहस्थी में वासना और देह ही सब कुछ नहीं होते। इसमें संतुष्टि और अनुशासन को भी स्थान देना होता है।
अगर हम ये मानें कि गृहस्थी एक वृक्ष है तो इसके फल क्या हैं। गृहस्थी के वृक्ष के दो ही फल हो सकते हैं संतुष्टि और शांति। अगर दाम्पत्य में ये दोनों फल नहीं हैं तो गृहस्थी बंजर है। ये दो फल ही तय करते हैं कि आपका दाम्पत्य कितना सफल है।
जिस घर में संतुष्टि और शांति नहीं हो, वो असफल है। परिवार के वृक्ष पर ये फल तब ही लगेंगे, जब जड़ें गहरी और मजबूत होंगी। जड़ों में जब पर्याप्त जल और खाद डाली जाती है, तब वृक्ष फलता-फूलता है। यही प्राकृतिक समीकरण गृहस्थी पर भी लागू होता है। जैसे वृक्ष हमसे मांगते कम हैं और हमें देते ज्यादा हैं, यही सिद्धांत जब परिवार के सदस्यों में उतरता है तो गृहस्थी यहीं वैकुंठ बन जाती है। समर्पण का भाव जितना अधिक होगा, देने की वृत्ति उतनी ही प्रबल होगी।
स्त्री और पुरुष दोनों के धर्म का मूल स्रोत समर्पण में है। इस प्रवृत्ति को अधिकार द्वारा लोग समाप्त कर लेते हैं। घर-परिवार में हम जितना अधिक अधिकार बताएंगे, विघटन उतना अधिक बढ़ जाएगा। प्रेम गायब हो जाएगा और भोग घरभर में फैल जाएगा। एक-दूसरे को सुख पहुंचाने, प्रसन्न रखने के इरादे खत्म होने लगते हैं और मेरे लिए ही सबकुछ किया जाए, यह विचार प्रधान बन जाता है। स्वच्छंदता यहीं से शुरू होती है, जो परिवार के अनुशासन को लील लेती है।
भागवत में चलते हैं, ऋषि कश्यप और दिति के दाम्पत्य में। ऋषि कश्यप की कई पत्नियां थी, वे सभी बहनें थी और प्रजापति दक्ष की पुत्रियां थी। धरती के सारे जीव, देवता और दानव इन्हीं की संतानें मानी जाती हैं। अदिति से सारे देवताओं का जन्म हुआ, जबकि दिति से दानवों का। पिता एक ही है लेकिन संतानें एकदम अलग-अलग। सिर्फ दाम्पत्य में संतुष्टि और शांति का फर्क है। अदिति और कश्यम के दाम्पत्य में ये दोनों बातें थीं लेकिन दिति ने अपने भोग और वासना के आगे, शांति और संतुष्टि दोनों को त्याग दिया।
जिस समय ऋषि कश्यप संध्या-पूजन के लिए जा रहे थे, दिति ने कामवश होकर उसी समय उनसे रतिदान मांग लिया। देव पूजन के समय भी संयम नहीं बरता गया। कश्यम ने पत्नी की इच्छा तो पूरी कर दी लेकिन उसे ये भी बता दिया इस रतिदान से जो संतानें उत्पन्न होंगी वे सब दुराचारी होंगी।
गृहस्थी में वासना और देह ही सब कुछ नहीं होते। इसमें संतुष्टि और अनुशासन को भी स्थान देना होता है।
गृहस्थी में ये दो बातें जरूरी हैं तभी मिलेगा सुख
Reviewed by Naresh Ji
on
February 19, 2022
Rating:
Reviewed by Naresh Ji
on
February 19, 2022
Rating:
No comments: